Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
गतैरभ्यागतैः स्वच्छैश्चपलैर्मलिनैर्जडैः ।
न रागो नाम्बुधेर्द्वेषो भोगैश्चाधिगतात्मनः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
द्वैत की अस्तिद्धि ही कैसे है एसी आशंका कर शरीर और आत्मा के सम्बन्ध में दर्शाई गई दूषण
युक्ति का वहाँ पर (द्वैत की असिद्धि मे) भी अतिदेश करते हैं।
हे श्रीरामजी, यदि कोई द्वैत में सत्यता की आशंका करे तो उसमें पूर्वोक्त इन्हीं युक्तियों का
आश्रय करना चाहिए । तात्पर्य यह हुआ कि द्वितीय वस्तु की सिद्धि होने पर ही द्वैत की सिद्धि हो सकती
है। यदि द्वितीय वस्तु चित् है, तो उसमें भेदक का अभाव होने से द्वैतसिद्धि की आशा करना ही व्यर्थ है ।
यदि द्वितीय वस्तु जड़ है, तो छाया और धूप की नाईं चित् और जड़ का परस्पर विरोध होने से पूर्वसिद्ध
चित् के विरुद्ध जड़ पदार्थ सिद्ध ही नहीं हो सकता। यदि यह कहा जाय कि चित् अपने से असम्बद्ध अर्थ
का साधन करता है, तो उससे भी कुछ मतलब सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि दावाग्नि में सागर है, इस
कथन के सदृश ही तथोक्त कथन असंभवार्थक है । यदि द्वैत को अध्यस्त माना जाय, तो वह
चित्साक्षात्कार से विलीन हो जायेगा । निर्मलत्व आदि आत्म स्वभाव से विरुद्ध, मलिन देहादि जड़
पदार्थो की असंग आत्मा से सिद्धि कैसे हो सकती है इत्यादि पूर्वोक्त युक्तियों का प्रकृत में भी साम्य
होने के कारण उपन्यास करना चाहिए, इसलिए द्वैतअ्रम का परित्याग कर अद्वितीय चिन्मात्र में ही आप
निष्ठा कीजिये । उसमें न तो किसी का कभी बन्धन होता है और न किसी का कभी मोक्ष होता है यानी
उक्तावस्था में बन्ध, मोक्ष आदि की शंका ही नहीं हो सकती