Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 73, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न सन्नासन्नसौ देवो नाणुर्नापि महानसौ ।
नाप्येतयोर्दृशोर्मध्यं स एवेदं च सर्वतः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र के जल में तृण एक दूसरे से मिल जाते हैं और पृथक् हो जाते हैं, वैसे
ही रागाभिमान से विनिर्मुक्तिपूर्वक ही पुत्र, पशु आदि प्राणी अथवा पृथ्वी आदि भूत स्वनिर्मित देह में या
स्वाधिष्ठान आत्मा में एक दूसरे से मिल जाते हैं और पृथक् हो जाते हे