Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 73, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अथेमामपरां दृष्टिं श्रृणु रामानया यथा । दृश्यस्यात्मानमचलं भविष्यसि च दिव्यदृक् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं गोरा हूँ, मैं मोटा हूँ इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से आत्मा में देहरूपता का साक्षात्‌ अनुभव होता है, अतः देह का विनाश होने पर आत्मा की स्थिति कैसे हो सकती है ? तो इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, जो कुण्ड और बदर का (बेर के वृक्ष या फल का) न्याय है ओर जो घट ओर आकाश की मर्यादा है, वही यहाँ पर भी (देह और आत्मस्थल में भी) समझनी चाहिए। (तात्पर्य यह है कि जैसे कुण्डे मेँ बेर', "घटाकाश! इत्यादि व्यवहारों मे कुण्डे ओर बेर का तथा घट और आकाश का सम्बन्ध प्रतीत होता है, पर उनका तादात्म्य प्रतीत नहीं होता, वैसे ही" मैं गोरा हूँ” इत्यादि व्यवहार से शरीर और आत्मा का तादात्म्य सम्बन्ध प्रतीत होता है, पर वास्तव में वह नहीं है ।) ऐसी स्थिति में एक कुण्ड या घट के नष्ट हो जाने पर कुण्ड ओर बदर तथा घट और आकाश दोनों भी नष्ट हो गये, ये इस प्रकार मूर्खो की व्यर्थ कल्पना है