Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 73, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अहं तमोऽहमभ्राणि भूः समुद्रादिकं त्वहम् ।
रजो वायुरथाग्निश्च जगत्सर्वमिदं त्वहम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आत्मा का देह के साथ तादात्म्य नहीं है, तो जैसे शाखा के कम्पनों से वृक्ष मेँ कम्पन होता है,
वैसे ही देह की प्रवृत्ति से आत्मा संसार का भागी क्यो होता है ? इस पर कहते है।
जिस प्रकार घोडे आदि की लगाम और रथ का सम्बन्ध प्रीति ओर द्वेष की योग्यता से रहित है, उसी
प्रकार चिति का भी देह, चित्त, इन्द्रिय आदि के साथ सम्बन्ध प्रीति और द्वेष की योग्यता से रहित है