Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आत्मन्यतीते सर्वस्मात्सर्वभूतेऽथवा तते ।
को बन्धः कश्च वा मोक्षो निर्मूलं मननं कुरु ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुकुलतिलक उन
दो अहंकार -दृष्टियो में पहली सबसे परे आकाश की नाई स्थूल स्वभाव वर्जित, जाग्रत् आदि तीन
अवस्थाओं से युक्त तथा दृश्यों से शून्य भे हूँ" इस प्रकार की हे ओर दूसरी 'सभी कुछ मैं हूँ” इस प्रकार
की है