Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
भवत्यपेतसंरम्भो वृष्टिमूक इवाम्बुदः ।
तिष्ठत्यात्मनि संवेत्ता प्रशान्त इव वारिधिः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्रकाश स्वरूप
आत्मा के अवस्थित होने पर आत्मसत्ता से अपनी स्थिति को प्राप्त करनेवाली देह यदि नष्ट हो जाती
है, तो उससे आत्मा में क्या हुआ ? अर्थात् कुछ भी नहीं