Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
भवत्यात्मनि निर्वाणः प्रशान्त इव दीपकः ।
तृप्तिमायाति परमां नरः पीतामृतो यथा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए आत्मा को अज्ञान से ही अनर्थ की भ्रान्ति हुई है, यह कहते हैं।
आत्मा के प्रबोध से उत्पन्न, आत्मशून्य वस्तु में आत्मभाव को प्राप्त हुई, रज्जु में सर्प भ्रम के
सदृश, भ्रान्ति केवल दुःख के लिए ही हे