Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 3 ,4
संस्कृत श्लोक
तयानया विकारिण्या तदतद्भावभूतया ।
इदं संपन्नमखिलं तापादिव मरौ पयः ॥ ३ ॥
मनो बुद्धिरहंकारो वासनाश्चेन्द्रियाण्यपि ।
एवंकलितनामाङ्कैः स्फुरत्यात्माब्धिरम्बुभिः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं आकाश हूँ, मैं
आदित्य हूँ, मैं दिशाएँ हू मेँ अधः हूँ, मै ऊर्ध्व हूँ, मैं दैत्य हूँ, मैं देव हूँ, मैं लोक हूँ और मैं चन्द्र आदि की
प्रभा हूँ। मेँ अन्धकार हूँ, मैं मेघ हूँ, मैं पृथ्वी हूँ, मैं समुद्र आदि हूँ तथा रेणु, वायु, अग्नि एवं यह समस्त
जगत् मैं ही हूँ