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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

मनोहंकारयोरन्तर्द्वयोरेकतरक्षये । क्षीणे द्वे एव हि यथा पटशौक्ल्ये पटक्षये ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कमलनयन पापशून्य श्रीराघव, इस समस्त जगत्‌ के आत्मस्वरूप से अवस्थित हो जाने पर क्या अपना ओर क्या पराया रहेगा ? यह आप मुझसे कहिये अर्थात्‌ अपना ओर पराया कुछ भी नहीं रहेगा