Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मुक्तेनापि त्रिनेत्रेण सौन्दर्यतरुमञ्जरी ।
देहार्धे धार्यते गौरी कामुकेनेव कामिनी ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
असलियत में असत्य
ही है, तथापि असत्यत्वरूप से अज्ञात अतएव सत्य-सी दीखाई पडनेवाली यह अज्ञतारूपा वासना
(अविद्या) मनरूपी मत्त मृग को, जो विषयों की तृषा से आक्रान्त है, उस प्रकार खींचती है, जिस प्रकार
जल की तृषा से आक्रान्त मृग को मृगतृष्णा खींचती हे