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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

भृङ्गीशो रक्तमांसं स्वं स्वमात्रे प्रवितीर्णवान् । मुक्तयैव धिया राम धीरया ध्यानधौतया ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, जैसे दीपक से अन्धकार नष्ट हो जाता है ओर प्रकाश आ जाता हे, वैसे ही परमार्थरूप आत्मा के अवबोध से वासनामूल नष्ट हो जाता है और अपरिच्छिन्न आत्म प्रकाश आविर्भूत हो जाता हे