Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
संस्थिता व्यवहारेषु विचित्राचारधारिषु ।
अन्तराशीतलाः केचित्केचिन्मूढाः शिलासमाः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शरद्काल मेँ निर्मलत्व आदि शोभा से आकाशतल अत्यन्त सुशोभित
होता है, वैसे ही वह तत्त्वज्ञानरूपी उत्तम शोभा से सुशोभित होता है ओर जैसे कल्प के अन्त में
(महाप्रलय में) समुद्र अपनी सीमा में नहीं समाता, वैसे ही वह अपने में नहीं समाता यानी उस समय
किसी से परिच्छिन्न नहीं होता