Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
विधेर्विचित्रा नियतिरनन्तारम्भमन्थरा ।
संनिवेशांशवैचित्र्यात्सर्वं सर्वत्र दृश्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्ववेत्तापुरुष विषयी पुरुषों के
संग और विषयों के अनुरंजन से वर्जित, मान और मानसिक चिन्ताओं से शून्य, आत्मविषय मे आसक्त,
परिपूर्ण और विशुद्ध अन्तःकरण युक्त होता है ॥३ ३॥ आत्मज्ञानी कामरूपी कीचड़ के लेप से रहित,
बन्धन स्वरूप आत्मभ्रम से शून्य, सुख-दुःख आदि द्वन्द्रों से उन्मुक्त तथा संसाररूपी सागर से तरा
हुआ रहता है