Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 64
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हिन्दी अर्थ
जो तत्त्वज्ञ गृहस्थ है, वह अपने स्त्री आदि के लिए उपभोग का आस्वाद होने पर भी रागी पुरुष की
नाई भ्रमग्रस्त नहीं है, ऐसा कहते है ।
हे भद्र, काकतालीय की नाई प्राप्त हुई ललना आदि भोगपंक्तियाँ आस्वादित होने पर भी तत्त्वज्ञ
धीर पुरुष को न दुःख के लिए तथा न तुष्टि के लिए होती है