Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 91
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 91 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 91
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हिन्दी अर्थ
हे राघव, मन के विनाशपर्यन्त भूमिका में सुप्रतिष्ठित पुरुष धीर तत्त्वज्ञ यद्यपि पूर्वकालिक
प्रारब्धफलरूपी कर्म से विधुर भोगशन्य दरिद्र-अवस्था में या माण्डव्य की नाई शूलाधिरोहण (शूली
पर चढाना) रूपी संकटावस्थाओं मेँ या उत्तम नगरस्थ सदन में या भयंकर अटवी में या तपोवन में भले
ही रहे, तथापि वह सदा-सर्वदा सुख दुःख के संनिपात से दूर ही रहता है, तनिक भी संसारिक हर्ष,
शोक के साथ उसका सम्बन्ध नहीं होता, यह भाव है