Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अनिशं चरतां देहगेहे गगनगामिनाम् ।
प्राणादीनां परिस्पन्दो वायूनां रोध्यते कथम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ उदार चरित और उदार
आकार से युक्त है, सम है, सौम्य सुख का समुद्र है, सुस्निग्ध है उसका स्पर्श सर्वविध संताप का
अपहरण करनेवाला है और वह पूर्णचन्द्र की नाई पूर्ण उदय से समन्वित है