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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

पूरके नूनमभ्यस्ते पूराद्गिरिघनस्थिते । प्राणे प्रशान्तसंचारे प्राणस्पन्दो निरुद्ध्यते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

मन का यदि अभाव है, तो शरीर वेष्टा आदि की उपपत्ति कैसे हो सकती है 2 तो इस पर कहते है । दोलारूपी सुखशय्या मेँ उपविष्ट बालक का अन्तःकरण जैसे अंगोंकी आवली के अनुसन्धान से वर्जित होकर चेष्टा करता है, वैसे ही तत्त्वज्ञ का अन्तःकरण भी किसी प्रकार के बाह्य के अनुसन्धान से वर्जित होकर चेष्टा करता है अर्थात्‌ तत्त्वज्ञ का अंगचलन स्वानन्द के आविर्भाव के उल्लास से ही होता है, श्रुति भी हे : "तद्यथा महाराजो वा महाब्राह्मणो वा महाकुमारो वा अतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीत" (जैसे छोटा बालक, स्वाधीन प्रकृतिवाला महाराज एवं विद्याविनय-सम्पन्न शास्त्रोक्त कमनुष्ठान करनेवाला विद्वान्‌ दुःख विनाशक आनन्द की अवस्था प्राप्त कर सोता हे, वैसे ही यह विज्ञानमय तत्त्ववेत्ता समस्त संसार-धर्मो से वर्जित होकर सोता है)