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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

तालुमूलगतां यत्नाज्जिह्वयाक्रम्य घण्टिकाम् । ऊर्ध्वरन्ध्रगते प्राणे प्राणस्पन्दो निरुद्ध्यते ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, जिसके समस्त अर्थ अनुपादेय हो गये हैं, ऐसा तत्त्ववेत्ता सब प्रकार से समस्त वस्तुओं का ग्रहण भी करता है ओर परित्याग भी करता है, यों बालक के सदुश उसकी चेष्टा रहती हे