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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

न चेत्यमन्यन्नो चित्तं ब्रह्मैवेदं विजृम्भते । सर्वमेकं परं व्योम को मोक्षः कस्य बन्धता ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इस सर्ग की समाप्तिपर्यन्त इसी प्रश्न के उत्तर का वर्णन करनेवाले महाराज वस्िष्ठ चित्तस्पन्द प्राण-स्पन्दन के अधीन है, यह बतलाने के लिए पहले प्राण के स्वरूप को कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे जलस्यन्दनमार्गभूत पृथ्वी के विवरों में जल चारों ओर व्याप्त होकर प्रस्फुरित होता है, वैसे ही इस देह में विद्यमान हजारो नाड़ियों में चारों ओर जो वायु प्रस्फुरित होता है, वह प्राणवायु है