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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 8, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्त्यस्तमितसर्वापदुद्यत्संपदुदारधीः । विदेहानां महीपालो जनको नाम वीर्यवान् ॥ १ ॥ कल्पवृक्षोऽर्थिसार्थानां मित्रालानां दिवाकरः । माधवो बन्धुपुष्पाणां स्त्रीणां मकरकेतनः ॥ २ ॥ द्विजकैरवशीतांशुर्द्विपत्तिमिरभास्करः । सौजन्यरत्नजलधिर्भुवं विष्णुरिवास्थितः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

महाबली उदारमति श्रीजनकजी विदेह देशों के शासक थे उनकी सब आपत्तियाँ निवृत्त हो चुकी थी ओर दिन दूनी और रात चौगुनी सम्पत्ति बढ़ रही थी | वे याचको के (मनोरथ पूर्ण करने के कारण) कल्पवृक्ष थे, इष्टमित्ररूपी कमलो के सूर्य के तुल्य विकासकारी थे, बन्धुबान्धवरूपी फूलों की वसन्त ऋतु के तुल्य अभिवृद्धि करनेवाले थे, स्त्रियों के कामदेव तुल्य रतिवर्द्धक थे, ब्राह्मणरूपी कुमुदं के लिए चन्द्रमा थे यानी चन्द्रमा के तुल्य उल्लासक थे, शत्रुरूपी अन्धकार के लिए भास्कर थे यानी भगवान सूर्य के तुल्य उसके निवर्तक थे, सौजन्यरूपी मणियों के सागर थे ओर भगवान के तुल्य पालन के लिए वे पृथिवी में स्थित थे

सर्ग सन्दर्भ

सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग वसन्त ऋतु में उपवन में विहार कर रहे श्रीजनकजी ने सिद्धों द्वारा गीत शुभ श्लोक सुने, यह वर्णन ।