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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं विचार्य बुद्ध्वान्तः पुनरित्थं विचार्यते । तत्त्वविद्भिर्महाबाहो ज्ञेय आत्मा महात्मभिः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी अपने हृदय में विचार (आगे कहा जानेवाला विचार) कर रहे विवेकी आत्मा को सर्वदा संमुख स्थित भी दिव्य भोगों मेँ अभिरुचि उत्पन्न ही नहीं होती

सर्ग सन्दर्भ

उन्‍नासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग॑ जिस विचार के सुदृढ़ होने पर संमुख स्थित भी दिव्य भोगों में इच्छा उत्पन्न नहीं होती, उस विचार का वर्णन |