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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अविद्यत्वादचित्तत्वान्मायात्वाच्चासदेव हि । ध्रुवं नास्त्येव वा चित्तं भ्रमादन्यत्खवृक्षवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव का स्वामित्व केवल चक्षु पर ही नहीं है, किन्तु कार्यकारणसमूह, काम, कर्म, वासना तथा उसके अनेक विध फल भेदो पर भी है । इस स्थिति में अहंकार, बुद्धि, मन एवं प्राण की परम्परा से किसी तरह से स्वत्वकोटि मेँ प्रविष्ट एक चक्षु का कभी अनिष्टरूप के साथ सम्बन्ध प्राप्त हुआ भी तो उसकी गणना ही क्या है ओर उससे जीव को दुःख की प्रसक्ति ही कैसे हो सकती है, इस आशय से कहते हैँ । नेत्र के अनिष्टरूप में निमग्न होने पर जीव को क्षोभ ही कैसे ? सेना के अन्तर्गत धोबी का गदहा अल्प जलाशय में यानी छोटे तालाब में डूबा, तो उससे सेनापति की क्षति ही क्या हुई ?