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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

त्यजदेवानुगृह्णाति वृत्तीरिन्द्रियवर्धिताः । यस्मान्निवार्यते तस्मिन्प्रोन्मत्त इव धावति ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं तो इतने समय तक मूर्खतावश नित्यअनित्य वस्तु के विषय में किसी प्रकार का विचार न कर रहा केवल परिच्छिन्न देहादि के स्वभाव से युक्त होकर वर्तमान था । सम्प्रति विचार से परिच्छिन्न आत्मस्वभाव होकर विचार करनेवाला मैं कहाँ चला गया, इसका निरूपण करने में असमर्थ हूँ