Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
एताश्चान्याश्च बह्व्योऽपि त्वयीन्द्रियगणे सति ।
पिशाच्य इव शर्वर्यां प्रवल्गन्त्यशुभश्रियः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रियों केद्वारा वर्धित मन पूर्व पूर्व वृत्तियों का त्याग करते ही उत्तरोत्तर तदनुसारिणी इन वृत्तियों
को ग्रहण कर लेता हे ओर जिस विषय से उसको हटाया जाता हे, उसी विषय में अत्यन्त उन्मत्त की
नाई दौडता हे