Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
आत्मा त्वस्त्वेव चास्त्वेव यस्मादन्यत्र विद्यते ।
अयमात्माहमेवासौ नास्त्यन्यन्मदृते क्वचित् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस स्थिति मे हे चित्त, आत्मा ही अपने ज्ञान से तुम्हारे जैसा हुआ है ओर अपने ज्ञान से तुम्हारे
भाव से मुक्त हो जाता है, ऐसा कहते हैँ ।
हे चित्त, इस प्रकार तुम अज्ञानरूपी आत्मशक्ति से ही प्राप्त हुए हो । ज्ञान होने पर तुम ऐसे गलित
हो जाते हो, जैसे तीव्र धूप में हिम