Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
प्रतियोगिव्यवच्छेदकलनैकस्य वै कुतः ।
अहं तेनायमात्मेति कलनामनुदाहरन् ।
मौनी स्वात्मनि तिष्ठामि तरङ्ग इव वारिणि ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
एेन्द्रजालिक लता की नाई चित्त की कल्पना मिथ्या है । इस
ब्रह्माण्ड में विज्ञान मात्ररवभाव ब्रह्म का ही स्वरूप सर्वोपरि विराजित हे