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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 56

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

तब मेरा तात्विक स्वरूप क्या है ? ऐसी चित्त की आशंका होने पर (अन्तिम आत्मसाक्षात्कारात्मक वृत्ति से अविद्या के साथ तुम्हारी जडता और तुम्हारे अन्दर रहनेवाले चिदाभासका क्षय हो जाने पर चरम साक्षात्कार से आविर्भूत जो स्वप्रकाश पूर्णात्मा का स्वरूप है, वही तुम्हारा तात्तिक स्वरूप है, वही तुम हो, ऐसा कहते हैं। त्रिकाल में बाधित न होनेवाले आत्मा के साक्षात्कार से चित्त और उसकी जड़ता का क्षय हो जाने पर उससे (चरम यथार्थ साक्षात्कार से) आविर्भूत स्वसंवेदनमात्र स्वरूप है, वही चित्त का तात्त्विक स्वरूप है