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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 83

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 83

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे चित्त, अपने निर्मल स्वभाव से तुमने जब असंदिग्ध और प्रत्यक्ष रूप से यह जान लिया कि वस्तुरूप से प्रसिद्ध तथा पद और अर्थो मेँ सारभूत केवल संवित्स्वभाव आत्मा ही समस्त दिशाओं को पूर्ण कर स्थित है, तब मेरे सुख-दुःखों के लेश उस प्रकार क्षीण हो गये, जिस प्रकार मृगतृष्णा में प्रतीत जल, रज्जु में प्रतीत सर्प और शुक्तिसीपी में प्रतीत रजत सत्यज्ञान से क्षीण हो जाते हैं, क्योंकि निश्चय ही पूर्वोक्त सुख-दु:ख प्रत्यय भ्रान्तिरूप है, यथार्थ नहीं हैं