Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verses 34–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 34-36
संस्कृत श्लोक
यः शक्रोऽनवबुद्धात्मा सोऽद्य दीनेषु पार्थिवः ।
कर्तुं प्रवृत्तो मृगयां क्षणेऽस्मिन्नपि कानने ॥ ३४ ॥
यो हंसोऽनवबुद्धात्मा पाद्मे पैतामहेऽभवत् ।
स्थितः स एव दाशेन्द्रः कैलासवनकुञ्जके ॥ ३५ ॥
यो राजानवबुद्धात्मा भूमेः सौराष्ट्रमण्डले ।
स एषोऽद्य स्थितोऽन्ध्राणां ग्रामे बहुलपादपे ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सखे, इतने समय तक तुम्हारे
स्वरूप के विषय में बहुत कम विवेक रहा, इसलिए तुम्हारे स्वरूप का अल्प विवेक होने के कारण ही दुःख
की हेतु तुम्हारी मोटाई उस प्रकार उत्पन्न हुई, जिस प्रकार मोहजनित संकल्पमात्र से बालक के शरीर
में वेताल उत्पन्न होता है, तुम्हारे मोटेपन से सुख-दुःख आदि द्रन्द्र, जो ब्रह्माजी के द्वारा किये गये
पदार्थो की उत्पत्ति ओर विनाश के संकल्प से संकल्प समय में ही नश्य सिद्ध हो जाने के कारण विनाशी
हैं। जिस विवेक के प्रसाद से ज्ञानोदय क्षण में अविद्याजनित प्राक्तन अपने स्वरूप का विनाश होने पर
नित्य यानी आदि और अन्त से शून्य आत्मा के स्वरूप का आविर्भाव हुआ उस विवेक को बार-बार
नमस्कार हैं