Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
तारकाकारकुमुदं सूर्यांशुकवदाकृति ।
वीतहव्यो ममज्जाशु सरस्युद्भिन्नपङ्कजे ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, सम्यक् ज्ञानवान् पुरुषों की यह वासना (देवराजत्व आदि अनुभव
की हेतु वासना) वासना ही नहीं है, क्योकि ज्ञानरूप अग्नि से अपनी शक्ति खो देने के कारण दग्ध और
दिखाई पड़ने के कारण दग्घ हुए बीज की बीजता ही क्या होगी ?