Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
मैत्र्या तया समतया परया च शान्त्या सत्प्रज्ञया मुदितया कृपया श्रिया च ।
युक्तो मुनिः सकलसङ्गविमुक्तचेता विन्ध्ये सरित्तटगतो दिनमेव रेमे ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन्मुक्त भी उस मुनि के भोगप्रद प्रारब्ध कर्मो से उद्बोधित दृढ़ संस्कार ही विलक्षण देहभोग
आदि के अनुभव में कारण था, यह कहते हैं।
जो जिस विषय के दृढ़ संस्कार से युक्त होता है, वह उस विषय को एक उसी प्रकार का देखता है,
क्योंकि उस प्रकार के दृढ़ संस्कार से ही जीवन्मुक्त होकर मुनि वीतहव्य ने उन-उन वस्तुओं का
अनुभव किया था