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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अज्ञान से यह मन ही उत्पत्ति और वृद्धि आदि परिणामों से जगत्‌ के रूप में ऐसा विकसित होता है, जैसे समुद्र में जल