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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तदसौ सुसमं स्फारं पदं परमपावनम् । सर्वभावान्तरगतमभूत्सर्वविवर्जितम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त यह वासना अनात्मा में आत्मत्वरूपा भ्रान्ति ओर वस्तु में अवस्तुत्वरूपा भ्रान्ति थी । वह आत्मा के अविचार से उत्पन्न हुई थी और आत्मा के विचार से विनाश को प्राप्त हो गई