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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सहप्रणवपर्यन्तदीर्घनिःस्वनतन्तुना । जहाविन्द्रियतन्मात्रजालं गन्धमिवानिलः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

मन से परे यानी मन के अविषय चारों ओर अवस्थित, पूर्ण सत्तासामान्यरूप परम साम्यभूत परमात्मा में विकारमुक्त होकर स्थाणु की तरह मैं स्थित हूँ