Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
मैत्र्यादयोऽथ मुदिताः शशाङ्क इव दीप्तयः ।
जीवन्मुक्तमनोनाशे सर्वदा सर्वथा स्थिताः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र नदी-प्रवाह और नदी-प्रवाह से प्राप्त तृण, काष्ठ आदि के अपने भीतर
प्रवेश से उपचयापचयरूप विकृति प्राप्त नहीं करता, वैसे ही तत्त्वज्ञ प्रारब्ध क्रम के अनुसार प्राप्त हुए
अनुकूल ओर प्रतिकूल वस्तुओं से भी किसी प्रकार की विकृति प्राप्त न कर अपने आत्मा की
अखण्डाकारवृत्तिरूपी पुष्पों से पूजा करता हुआ ही अपने स्वरूप मेँ स्थित रहता है