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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

प्रथम प्रश्न का उत्तर देने के लिए महाराज वस्निष्ठजी भूमिका बोधते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जो ज्ञानी की संवित्‌ राग आदि मलों से दूषित वासनारूपी ("देह ही मैं हूँ” इस प्रकार देह में अहंभाव की वासनारूपी) तन्तु से बँधी हुई रहती है, वही यहाँ देह के छेदन- भेदन से जनित सुख-दुःख दशारूपी दाह की आश्रय होती है