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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार अचेतन भोज्य आदि पदार्थो के विषय में भी प्रीति, अप्रीति ओर उदासीनता ये सब उनमें रहनेवाले गुण-दोष ओर गुण-दोष दोनों के अभाव का मन में प्रतिबिम्ब पडने से ही प्रसिद्ध है, इस आशय से कहते हैं। सरसस्वादु पदार्थ के विषय में यह मन लालची बन जाता है, नीर सस्वादु पदार्थ के विषय में स्पृहारहित हो जाता है और कटुपदार्थ के विषय में विरस हो जाता है, यह स्वयं सब लोग अनुभव करते हैं