Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
त्रिभिरेतैश्चिराभ्यस्तैर्हृदयग्रन्थयो दृढाः ।
निःशेषमेव त्रुट्यन्ति विसच्छेदाद्गुणा इव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् का संरोध करने से क्या फल है ? ओर संवित् यदि चित्ताकार हो जाय तो कौन दोष है ? इस
पर कहते है।
भली प्रकार उदित हुई संवित् तत्काल ही बाह्य विषयों की ओर राग वश चली जाती है, तदनन्तर
उनके उपभोग के संवेदन से चित्त को अनन्त दुःख उत्पन्न होते हैँ