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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

तस्माज्जगति जायन्ते पांसवोऽवकरादिव । प्राणस्पन्दजये यत्नः कर्तव्यो धीमतोच्चकैः ॥ ३२ ॥ उपविश्योपविश्यैकचित्तकेन मुहुर्मुहुः । अथवैनं क्रमं त्यक्त्वा चित्ताक्रमणमेव चेत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

वह भावना जिस प्रकार देह मे आत्मता दीखलाती है, उसी प्रकार बाह्य अर्थों में सत्ता भी दीखलाती है, ऐसा कहते हैं। वासना के द्वारा अत्यन्त वशीकृत उस भावना से भावित वह पुरुष, जिस किसी को देख लेता है, उस सबको वह यह सत्‌-वस्तु है, इस प्रकार मोह कर लेता है ॥ ३ १॥ वासना के वेग से पुरुष अपने रूप को छोड़ देता है और जिस प्रकार मदिरा के मद से दुष्टदृष्टि होकर वासना के द्वारा उपस्थापित समस्त भ्रान्त जगत्‌ के रूप को देखता है