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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

शुद्धां संविदमाश्रित्य वीतरागः स्थिरो भव । ज्ञानवानेव सुखवान्ज्ञानवानेव जीवति । ज्ञानवानेव बलवांस्तस्माज्ज्ञानमयो भव ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना के बीज का विनाश होने पर अन्य बीज से चित्त की उत्पत्ति कयो नहीं होगी ? तो इस पर कहते हैं। हे रामजी, चित्त के दो कारण है, एक प्राणस्पन्दन और दूसरा वासना । उन दो कारणों में से किसी एक का विनाश हो जाने पर तत्काल दोनों नष्ट हो जाते हैं ॥४ ८॥ हे श्रीरामजी, जैसे घटाकाश के द्वारा जल का स्वीकार करने में घट और जलाशय दोनों मिलकर कारण होते हैं। वैसे ही चित्त की उत्पत्ति में ये दोनों परस्पर मिल कर ही कारण होते हैं, एक कारण नहीं होता