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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 51–52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verses 51–52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 51,52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार चित्त की भी उन दोनों के प्रति और ऐन्द्रियक सुख-दुःख आदि के प्रति कारणता है, ऐसा कहते हैं। संवित्‌- स्वरूप यह चित्त सबको यथाक्रम से यानी पहले प्राण को, तदनन्तर इन्द्रियों को और तत्‌-प्रयुक्त आनन्द को उत्पन्न करता है, इसी प्रकार पूर्व में उपभुक्त विषयानन्द ओर तात्कालिक जीवनस्वरूप पवनस्पन्द में वासनारूप से भी चित्त की उत्पादकता है, ऐसा कहते हैं। जब आनन्द और पवन दोनों वासनास्वरूप हो गये, तब उन्होंने साथ मिल कर ही चित्त का उत्पादन किया । वे पुष्प में सुगंधि तथा तिल में तेल के समान व्यवस्थित हैं, इसलिए एक दूसरे का एक दूसरा आश्रय और एक दूसरा का एक दूसरे हेतु हो सकता है, अनावस्था दोष का प्रसंग नहीं हो सकता