Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 101

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 101 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 101

संस्कृत श्लोक

तयोदितप्रसरविलासशुद्धया गतज्वरं पदमवलम्बयामलम् । धियेद्धया पुनरिह जन्मबन्धनैर्न बध्यसे समधिगतात्मदृश्यया ॥ १०१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, उक्त आत्मविचार के द्वारा प्राप्त समाधि के विलास से समस्त वासनाओं का विनाश हो जाने से अतिस्वच्छ, समाधिगत आत्मतत्त्वरूप अवश्य दृष्टव्य पदार्थ से युक्त तथा विद्या और अविद्याकार्य के विनाश में समर्थ होने के कारण दीप्त बुद्धि से दुःखवर्जित निरतिशयात्मक सुखस्वरूप परमपद का अवलंबन कर आप अवस्थित हो जाइए । परमपद का अवलम्बन करने से पुनरावृत्ति की शंका नहीं रह जाती, ऐसा कहते हैं । भद्र, आप फिर इस संसार में जन्मों के बंधनों से बद्ध न होंगे। इससे एकमात्र तत्त्वसाक्षात्कार से ही अविद्या और उसके कार्यरूप समस्त अनर्थो के उपशम के अनंतर नित्य निरतिशयआनंदस्वरूप में प्रतिष्ठा होती है, यह सिद्ध हुआ