Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अब्धौ गुडगुडारावे प्रतिश्रुत्खस्वने गिरौ ।
निनादे च मृगेन्द्राणां न क्षुभ्यति मनागपि ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अब मोक्षरूप फल जिसका निश्चित है, उस धर्ममेघनामक (आत्मविवेक ज्ञान-प्रवाहरूप)
समाधि का परित्याग कर यज्ञ, दान आदि का, जिनके अनुष्ठान मे क्लेश अधिक, फल कम तथा
मोक्षफलकत्व में सन्देह है, अनुष्ठान भी केवल क्लेशमय ही है, यों प्रकृत विषय की प्रशंसा के लिए
कहते हैं ।
जिस प्रकार मृग कालक्षेप करते हैं, वैसे ही यज्ञ, तप, दान, तीर्थ, देवार्चन आदि भ्रमों के कारण
असंख्य मानस पीड़ाओं से युक्त होकर मनुष्य वृथा कालक्षेप करते हैं