Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verses 54–55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
अयःसंकुचिताङ्गासु नरकारण्यभूमिषु ।
परस्परेरितानन्तकुन्ततोमरवृष्टिषु ॥ ५४ ॥
न बिभेति न वादत्ते वैवश्यं न च दीनताम् ।
समः स्वस्थमना मौनी धीरस्तिष्ठति शैलवत् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष महर्षि माण्डव्य की नाई प्रारब्ध
कर्मो से प्राप्त हुई अगो को संकुचित करनेवाली नरक की अरण्यभूमियों मे, जहाँ पर एक दूसरों के
द्वारा अनेक बर्छी तोमर आदि शस्त्रविशेषों की वृष्टि हो रही है, न भयभीत होता हे, न व्याकुल होता
है ओर न तो दीन होता है, परन्तु वह सम, स्वस्थमन, मौनी ओर धीर होकर पर्वत की नाई अटल
रहता हे