Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
जगज्जरत्तृणलवो विषं चामृतमेव च ।
क्षणः कल्पसहस्रं च सममाततचेतसाम् ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जिन महात्माओं का चित्त परिपूर्ण आत्माकार के प्रतिफलन से विशाल हो गया है, उनकी
दृष्टि मेँ जगत्, जीर्णं तिनके का टुकड़ा, विष, अमृत, क्षण और हजारों कल्प ये सभी समानरूप
हैं