Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 79
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 79
संस्कृत श्लोक
न जिघ्रत्यपि संजिघ्रन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
पदार्थे च पतत्येव बलात्पतति नाप्ययम् ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अन्यत्रमना योगी भली
प्रकार सूँघ रहा भी नहीं सूँघता, नेत्र उन्मीलित कर रहा भी उन्मीलित नहीं करता, पदार्थो में यानी
अपने अपने विषयों मे संस्कारवश कर्मेन्द्रियों के संसृत होने पर भी यह संसृत नहीं होता