Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 1, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
इति शुभमनसां विवेकभाजामधिगतसारतयोदिताशयानाम् ।
अभजत विरतिं तदा त्रियामा मलिननिशाकरवक्रतां जगाम ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पवित्र मनवाले, विवेकी तथा आत्मतत्त्व प्रबोध के कारण विकासयुक्त आशयवाले उन
रामचन्द्र आदि की रात्रि जब समाप्त हो गई तब उसने सूर्यकिरणों के सम्बन्ध से मलिन हुए चन्द्रमा को
ही अपना मुख बना लिया