Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
संबन्धोऽयमसावन्तर्ह्रदि यो व्यपदिश्यते ।
न तं लभामहे सर्पं रज्जुसर्पभ्रमादिव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जिस प्रकार विमर्श करने पर रज्जु में हुए सर्पविभ्रम से किसी भी सर्पं की उपलब्धि
नहीं होती, उसी प्रकार हृदय के भीतर यह देह में अहन्ता और बाह्य विषयों मे ममतारूपी सम्बन्ध
व्यपदिष्ट होता हे, विचार करने पर उसकी किसी तरह उपलब्धि नहीं होती