Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यथा नरो गलन्निद्रो यावत्कलनया मनाक् । विमृशत्याशयं तावन्निद्रा तस्य विलीयते ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्यान्य भी दृष्टान्त बतलाते हैं। जिस प्रकार जिसकी नींद गलितावस्थ हो रही है, ऐसा पुरुष ज्यों ही बुद्धि से अपने चित्त के वृत्तान्त का तनिक विचार करता है, त्यों ही उसकी निद्रा नष्ट हो जाती है । उसी प्रकार अविद्या के किंचित्‌ विचारमात्र से अविद्या नष्ट हो जाती है