Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
आलोक आगते यादृक्तमस्तद्दृश्यते तथा ।
याऽवस्तुत्वे त्वविद्यायास्त्ववस्तुत्वं प्रतीयते ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह अवस्तु क्यो है ? इस आशंका पर अपना अनुभव ही उसके अवस्तु होने में प्रमाण है, यों
कहते है ।
प्रकाश के आने पर प्रसिद्ध अंधकार जैसे असद्रूप दीख पडता है, वैसे ही विचार से अविद्या भी
असत्-रूप ही दीख पडती हे । (यदि शंका हो कि अंधकार तम का प्रकाश से बाघ नहीं होता, क्योकि
उसके निषेध में त्रकालिकत्व की प्रतीति नहीं हे, किन्तु उष्णता से जलकी शीतता की तरह तिरोधानमात्र
होता है, क्योकि प्रकाश के चले जाने पर पुनः उसका दर्शन होता है, इस पर कहते हैं ।) अंधकार को
अवस्तु मानने में वैसी भले ही आपत्ति हो, परन्तु त्रैकालिक बाध का अनुभव होने से अविद्या में अवस्तुत्व
ही प्रतीत होता है । सारांश, अविद्या के अवस्तुत्व में अनुभव ही प्रबल प्रमाण हे